गांव की समस्याएं मीडिया के सामने उठाने के बाद दलित ग्रामीण के 50 साल पुराने मकान पर चला बुलडोजर, कार्रवाई को लेकर उठे गंभीर सवाल

कुरुक्षेत्र। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के पैतृक गांव मंगोली जट्टान में एक दलित ग्रामीण के ठिकाने पर हुई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीण नायब सिंह का आरोप है कि उसने गांव की समस्याओं और कथित अनियमितताओं को मीडिया के सामने उठाया था, जिसके बाद उसके खिलाफ कार्रवाई की गई। प्रशासन की ओर से इसे पंचायत की जमीन पर निर्माण हटाने की कार्रवाई बताया जा रहा है।

नायब सिंह के मुताबिक, जिस मकान/ठिकाने पर बुलडोजर चलाया गया, उसका इस्तेमाल वह करीब 50 वर्षों से करता आ रहा था। यहां पशु बांधे जाते थे और घरेलू सामान रखा जाता था। उसका कहना है कि यदि पंचायत की जमीन पर अवैध कब्जों या निर्माण के खिलाफ अभियान चलाया गया है तो गांव में लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे अन्य स्थानों पर भी इसी तरह की कार्रवाई होनी चाहिए।

मीडिया के सामने गांव की समस्याएं उठाने का दावा

नायब सिंह का कहना है कि उसने हाल ही में गांव की समस्याओं को लेकर मीडिया से बातचीत की थी। इसी दौरान उसने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के परिवार से जुड़ी जमीन और गांव छोड़ने से संबंधित कुछ दावे भी किए थे। ग्रामीण के अनुसार, मुख्यमंत्री का परिवार कई दशक पहले गांव छोड़कर चला गया था और उस समय परिवार के पास करीब डेढ़ एकड़ जमीन थी, जिसे बेचकर वे बाहर चले गए थे।

नायब सिंह ने आगे आरोप लगाया कि वर्तमान समय में परिवार के पास काफी जमीन, कोठी, स्टोन क्रशर और डंपर आदि हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है। ऐसे में इन आरोपों को तथ्य के तौर पर नहीं बल्कि ग्रामीण के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।

‘पहले धमकाने की कोशिश, फिर पहुंचा बुलडोजर’

ग्रामीण नायब सिंह का आरोप है कि सोमवार को कैलाश सैनी नामक व्यक्ति उसके पास आया, जिसे वह मुख्यमंत्री का प्रतिनिधि बताता है। नायब सिंह के मुताबिक, बातचीत के दौरान उसे डराने की कोशिश की गई। उसका दावा है कि इसी के बाद सोमवार को प्रशासनिक अमला बुलडोजर लेकर उसके ठिकाने पर पहुंचा और निर्माण को गिरा दिया गया।

ग्रामीण का सवाल है कि यदि यह कार्रवाई पहले से निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थी तो उसे इसकी जानकारी कब और किस माध्यम से दी गई? क्या उसे लिखित नोटिस दिया गया था? कार्रवाई का आदेश किस अधिकारी ने जारी किया? और पंचायत की जमीन पर अन्य पुराने कब्जों को लेकर प्रशासन की क्या नीति है?

‘मेरा क्या कसूर है?’

कार्रवाई के बाद नायब सिंह ने इसे लेकर कई सवाल खड़े किए। उसका कहना है कि वह वर्षों से इसी स्थान का इस्तेमाल करता आ रहा था। उसने कहा कि यदि उसका कोई निर्माण नियमों के विरुद्ध था तो प्रशासन को नियमानुसार नोटिस देकर जवाब मांगना चाहिए था।

ग्रामीण ने सवाल उठाते हुए कहा, “मेरा क्या कसूर है? क्या मैं दलित हूं, इसलिए मेरे साथ ऐसा हुआ? या मैंने गांव की सच्चाई मीडिया के सामने बताई, इसलिए मेरे खिलाफ कार्रवाई की गई?”

नायब सिंह ने सरकार और प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा कार्रवाई के आधार और आदेश को सार्वजनिक करने की मांग की है।

प्रशासन बोला—निर्माण के लिए हटाया गया स्थान

मामले में प्रशासन का पक्ष जानने के लिए संबंधित कार्यालय में संपर्क किया गया। बीडीपीओ और ग्राम सचिव राजेश मौके पर अपनी सीट पर मौजूद नहीं मिले। इसके बाद फोन पर ग्राम सचिव राजेश से संपर्क किया गया।

ग्राम सचिव ने कार्रवाई को प्रशासनिक कार्रवाई बताते हुए कहा कि संबंधित स्थान पर भवन निर्माण किया जाना है, इसलिए वहां मौजूद निर्माण को हटाया गया। जब उनसे पूछा गया कि क्या कार्रवाई से पहले ग्रामीण को लिखित नोटिस दिया गया था और आदेश की प्रति उपलब्ध है, तो उन्होंने बताया कि लिखित नोटिस नहीं दिया गया था, बल्कि चौकीदार को भेजा गया था।

ग्राम सचिव ने कार्रवाई को नियमों के अनुसार बताया और ग्रामीण को शिकायत करने की बात कही। इसके बाद उन्होंने फोन काट दिया।

अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल

मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पंचायत की जमीन से कब्जे या निर्माण हटाने का अभियान चलाया गया है तो क्या गांव में मौजूद सभी ऐसे स्थानों पर समान कार्रवाई होगी? यदि हां, तो प्रशासन इसका कोई सर्वे या सूची सार्वजनिक करेगा?

दूसरा सवाल यह है कि क्या संबंधित ग्रामीण को कार्रवाई से पहले पर्याप्त सूचना और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था? यदि कोई लिखित नोटिस नहीं दिया गया था तो प्रशासन ने किस प्रक्रिया के तहत निर्माण हटाया?

तीसरा और सबसे अहम सवाल ग्रामीण के आरोप से जुड़ा है—क्या कार्रवाई का समय महज संयोग है या फिर मीडिया के सामने गांव की समस्याएं उठाने के बाद कार्रवाई होने के आरोप की भी जांच होगी?

फिलहाल प्रशासन ने कार्रवाई को भवन निर्माण के लिए की गई प्रशासनिक कार्रवाई बताया है, जबकि ग्रामीण इसे अपने खिलाफ की गई कार्रवाई बताते हुए इसके पीछे के कारणों की जांच की मांग कर रहा है। अब पूरे मामले में कार्रवाई के आदेश, जमीन की वास्तविक स्थिति, नोटिस प्रक्रिया और गांव में अन्य समान मामलों पर प्रशासन की कार्रवाई सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।

By admin

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