नई दिल्ली/अमर शर्मा । भारत में हनी ट्रैप का खतरा अब केवल आकर्षण, ब्लैकमेल या पैसों की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। खुफिया अधिकारियों के मुताबिक, इस तरह के नेटवर्क अब सोशल मीडिया और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का इस्तेमाल कर संवेदनशील जानकारी रखने वाले अधिकारियों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक अधिकारी ने दावा किया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ऐसे नेटवर्क के लिए प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की मदद ले रही है, जिनका काम संभावित लक्ष्यों की मानसिकता और निजी कमजोरियों को समझना है।
अधिकारी के अनुसार, ऐसे मामलों में किसी अधिकारी को सीधे निशाना बनाने के बजाय पहले उसके सोशल मीडिया व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। उसके पोस्ट, टिप्पणियां, बातचीत और सार्वजनिक रूप से साझा की गई निजी जानकारियों से उसकी मानसिक स्थिति तथा कमजोरियों को समझने की कोशिश की जाती है। इसके बाद महिलाओं के नाम और तस्वीरों वाले सोशल मीडिया प्रोफाइल के माध्यम से संपर्क स्थापित करने का दावा किया गया है।
पहले दोस्ती, फिर भरोसा और उसके बाद असली निशाना
खुफिया अधिकारियों के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में जल्दबाजी नहीं की जाती। कथित तौर पर लक्ष्य के साथ बातचीत शुरू करने के बाद उसे भावनात्मक समर्थन और सहानुभूति दी जाती है। उद्देश्य धीरे-धीरे ऐसा भरोसा कायम करना होता है, जिसमें सामने वाला व्यक्ति अपनी निजी परेशानियों और संवेदनशील बातों को साझा करने लगे।
अधिकारी के अनुसार, इस भरोसे को बनाने में करीब दो से तीन महीने तक का समय लगाया जा सकता है। यही वजह है कि इस तरह के ऑपरेशन को सामान्य सोशल मीडिया दोस्ती समझकर नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है।
निजी परेशानियां बन सकती हैं सबसे बड़ी कमजोरी
खुफिया अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर अपनी निजी समस्याओं, तनाव या निराशा को सार्वजनिक करने वाले संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारी ऐसे नेटवर्क के निशाने पर आ सकते हैं। कथित तौर पर मनोवैज्ञानिक तरीके से बातचीत को आगे बढ़ाकर व्यक्ति की कमजोरियों को समझा जाता है और फिर उसी आधार पर उसके साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश की जाती है।
इस रणनीति में लक्ष्य को यह एहसास तक नहीं होने दिया जाता कि उसके साथ कोई सुनियोजित ऑपरेशन चल रहा है। सामान्य बातचीत और भावनात्मक जुड़ाव के जरिए जानकारी हासिल करने की कोशिश की जाती है।
भरोसा बनने के बाद ऐप इंस्टॉल कराने की कोशिश
अधिकारी के मुताबिक, कथित नेटवर्क का अगला चरण तकनीकी खतरे से जुड़ा हो सकता है। भरोसा बनने के बाद लक्ष्य को किसी एप्लिकेशन या सॉफ्टवेयर को अपने मोबाइल अथवा कंप्यूटर में इंस्टॉल करने के लिए प्रेरित किया जाता है। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि ऐसे कुछ एप्लिकेशन में स्पाइवेयर या मैलवेयर छिपा हो सकता है, जिसके जरिए डिवाइस में मौजूद डेटा तक अनधिकृत पहुंच हासिल करने की कोशिश की जा सकती है।
ऐसे साइबर खतरों में निजी बातचीत, संपर्क, दस्तावेज और अन्य संवेदनशील डिजिटल जानकारी निशाने पर आ सकती है। हालांकि, किसी विशेष मैलवेयर या उसके निर्माण के स्रोत को लेकर स्वतंत्र तकनीकी पुष्टि आवश्यक होगी।
पैसे या धमकी से ज्यादा खतरनाक ‘भावनात्मक जाल’
अधिकारियों के अनुसार, हनी ट्रैप नेटवर्क की रणनीति में बदलाव चिंता का विषय है। पहले जहां पैसे, धमकी या ब्लैकमेल जैसे तरीकों पर अधिक जोर होने की बात सामने आती थी, वहीं अब कथित तौर पर व्यक्ति की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है।
यही तरीका सुरक्षा एजेंसियों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें पीड़ित को लंबे समय तक यह पता नहीं चलता कि वह किसी सुनियोजित जाल का हिस्सा बन चुका है।
एजेंसियों की लगातार एडवाइजरी के बावजूद चुनौती कायम
खुफिया एजेंसियां समय-समय पर सरकारी अधिकारियों और संवेदनशील संस्थानों से जुड़े कर्मचारियों को सोशल मीडिया पर सावधानी बरतने, अनजान लोगों से संपर्क को लेकर सतर्क रहने और संदिग्ध एप्लिकेशन इंस्टॉल न करने की सलाह देती रही हैं। इसके बावजूद कथित तौर पर कुछ अधिकारी ऐसे नेटवर्क के संपर्क में आ जाते हैं।
खुफिया अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल दौर में जासूसी और डेटा चोरी का यह बदलता तरीका गंभीर सुरक्षा चुनौती बन सकता है। खासकर ऐसे अधिकारियों के लिए, जिनके पास सरकारी नीतियों, सुरक्षा व्यवस्था या अन्य संवेदनशील सूचनाओं तक पहुंच होती है।
सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि अब खतरा केवल किसी पासवर्ड या दस्तावेज की चोरी तक सीमित नहीं है—बल्कि किसी व्यक्ति की भावनात्मक कमजोरी को पहचानकर उसे डिजिटल माध्यम से लंबे समय तक प्रभावित करने की कोशिश भी की जा सकती है।