ग्रीन पार्क की जमीन पर अवैध निर्माण को लेकर अदालत सख्त, दो महीने में कब्जा छोड़ने का वादा; चंद लोगों की कथित मनमानी से पत्रकारिता की साख पर भी सवाल
चंडीगढ़/जीरकपुर, अमर शर्मा। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकारों से उम्मीद की जाती है कि वे सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे, भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी के खिलाफ आवाज उठाएं। लेकिन जब किसी प्रेस क्लब का निर्माण ही सरकारी जमीन पर बिना कानूनी अधिकार के होने का मामला हाईकोर्ट तक पहुंच जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर समाज को आईना दिखाने का दावा करने वाली संस्था खुद सवालों के घेरे में कैसे आ गई?
जीरकपुर में ग्रीन पार्क/ओपन पब्लिक यूटिलिटी के लिए आरक्षित जमीन पर बने ‘जीरकपुर प्रेस क्लब’ को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सख्त रुख ने इस पूरे मामले को चर्चा में ला दिया है। मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नगर परिषद जीरकपुर की जमीन पर बिना कानूनी अधिकार के बने निर्माण को केवल प्रेस क्लब का नाम होने से वैध नहीं माना जा सकता।
अदालत के निर्देशों के अनुसार, “जीरकपुर प्रेस क्लब” को दो महीने के भीतर कब्जा खाली करने और वहां बने ढांचे को हटाने का वादा निभाना होगा। ऐसा नहीं होने पर नगर परिषद जीरकपुर कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगी। अदालत ने साफ कर दिया कि निर्धारित समयसीमा से आगे मोहलत नहीं दी जाएगी।
दूसरों को कानून का पाठ पढ़ाने वाले खुद सवालों के घेरे में!
यह मामला केवल एक निर्माण या जमीन खाली कराने तक सीमित नहीं है। इससे पत्रकारिता की साख और सार्वजनिक जमीन के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पत्रकारिता का काम सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था से जवाब मांगना है। ऐसे में यदि किसी पत्रकार संगठन की संपत्ति या निर्माण पर ही कानूनी अधिकारों को लेकर सवाल उठें, तो उस पर जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हो जाती है।
हालांकि, इस मामले में पूरे पत्रकार समुदाय को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। सवाल उन लोगों और उस संस्था की भूमिका पर है, जिनका नाम इस निर्माण से जुड़ा है। अदालत के सामने आए मामले और उसके निर्देशों के बाद यह जानना जरूरी हो जाता है कि संबंधित जमीन पर निर्माण किस आधार पर किया गया, इसके लिए कोई अनुमति ली गई थी या नहीं और सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि पर ढांचा खड़ा होने की स्थिति कैसे बनी।
यदि कुछ पत्रकार या पत्रकार संगठनों से जुड़े लोग ऐसे निर्माण को बचाने, कार्रवाई टालने या तथ्यों को दबाने की कोशिश करते हैं, तो यह केवल कानून की अवहेलना नहीं, बल्कि पत्रकारिता के नाम और देश के चौथे स्तंभ की गरिमा को कमजोर करने का प्रयास भी माना जा सकता है। जो लोग दूसरों से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हैं, उनसे स्वयं कानून के पालन और सार्वजनिक संपत्ति के सम्मान की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।
ग्रीन पार्क की जमीन पर निर्माण, जनहित याचिका के बाद हाईकोर्ट की सख्ती

जनहित याचिका CWP-PIL-210-2026 में याचिकाकर्ता खुशविंदर सिंह ने आरोप लगाया था कि जीरकपुर के कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के सामने ग्रीन पार्क/ओपन पब्लिक यूटिलिटी के लिए आरक्षित जमीन पर अवैध निर्माण किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मुकेश कुमार वर्मा और धर्म पाल सैनी ने अदालत में पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात आई कि “जीरकपुर प्रेस क्लब” कई वर्षों से उक्त जमीन पर मौजूद है, जबकि निर्माण के लिए कानूनी आधार का सवाल उठाया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जमीन पर लंबे समय से मौजूद रहने या किसी संस्था के नाम का इस्तेमाल करने से निर्माण को स्वतः कानूनी मान्यता नहीं मिल जाती।
यही इस मामले का सबसे अहम पहलू है—यदि जमीन सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित है, तो उसके इस्तेमाल और निर्माण का आधार भी कानून के अनुरूप होना चाहिए।
दो महीने का अल्टीमेटम, अब वादे पर अमल की बारी
सुनवाई के दौरान “जीरकपुर प्रेस क्लब” के वकील ने अध्यक्ष से प्राप्त निर्देशों के आधार पर अदालत को बताया कि दो महीने का समय मिलने पर क्लब स्वेच्छा से कब्जा खाली कर देगा और ढांचा भी हटा देगा। अदालत ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए निर्धारित अवधि में कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि प्रेस क्लब अदालत के सामने किए गए वादे को समय पर पूरा करता है या नगर परिषद को कार्रवाई के लिए आगे आना पड़ता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रेस क्लब उचित स्थान के आवंटन के लिए संबंधित अधिकारियों से नियमानुसार संपर्क कर सकता है, लेकिन इस विकल्प का इस्तेमाल मौजूदा वादे से पीछे हटने के लिए नहीं किया जा सकता।
पत्रकारिता की साख बचाने के लिए जवाबदेही जरूरी
पत्रकारिता की विश्वसनीयता निष्पक्षता, ईमानदारी और कानून के सम्मान से बनती है। यदि किसी प्रेस क्लब के निर्माण पर ही कानूनी सवाल उठें, तो संबंधित पदाधिकारियों को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। किसी संस्था से जुड़े कुछ लोगों के आचरण पर सवाल उठने का अर्थ यह नहीं कि पूरा पत्रकार समुदाय दोषी है, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर किसी को भी कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं मिल सकता।
जो पत्रकार या पदाधिकारी कथित अवैध निर्माण को बचाने के लिए दबाव बनाने, प्रशासनिक कार्रवाई में बाधा डालने या अदालत के निर्देशों को कमजोर करने की कोशिश करेंगे, वे अनजाने में नहीं बल्कि सीधे तौर पर पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसी कोशिशें लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की गरिमा को बचाने के बजाय उसे खत्म करने की दिशा में कदम साबित हो सकती हैं। पत्रकारिता का दायित्व कानून से ऊपर खड़ा होना नहीं, बल्कि कानून के शासन की रक्षा करना है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है? क्या “जीरकपुर प्रेस क्लब” अदालत के सामने किए गए वादे के अनुसार दो महीने में जमीन खाली कर देगा, और क्या संबंधित अधिकारी सार्वजनिक जमीन के संरक्षण को लेकर अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे? जीरकपुर में इस मामले का अगला कदम न केवल जमीन के इस्तेमाल, बल्कि जवाबदेही और पत्रकारिता की साख के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगा।